अल्ट्रासाउंड में बच्चे की हार्ट बीट कितनी होनी चाहिए?HealthPlanet

Posted on Mon 17th Oct 2022 : 09:20

Fetal Heart Rate Monitor : प्रेग्‍नेंसी में बहुत जरूरी है ये टेस्‍ट करवाना, इसकी मदद से समय पर बच सकती है बच्‍चे की जान
प्रेगनेंट होने के बाद शिशु की स्‍वास्‍थ्‍य स्थिति और किसी कॉम्प्लिकेशन के बारे में जानने के लिए कई तरह के टेस्‍ट किए जाते हैं जिनमें से एक फीटल हार्ट रेट मॉनिटरिंग भी है। इस टेस्‍ट से भ्रूण के दिल की धड़कन का पता चलता है।
फीटल हार्ट रेट मॉनिटरिंग से बेबी का हार्ट रेट और रिदम पता चलता है। इससे डॉक्‍टर को यह पता चलता है कि बच्‍चे की स्‍वास्‍थ्‍य स्थिति क्‍या है। प्रेग्‍नेंसी के आखिरी दिनों और लेबर के दौरान फीटल हार्ट रेट मॉनिटरिंग की जाती है। फीटल हार्ट रेट 110 से 160 बीट प्रति मिनट होता है। यह प्रति मिनट 5 से 25 बीट भी हो सकती है। गर्भाशय की स्थिति के अनुसार शिशु कैसे रिस्‍पॉन्‍स करता है, इससे फीटल हार्ट रेट बदल सकता है। शिशु की दिल की धड़कन असामान्‍य आने का मतलब यह हो सकता है कि बच्‍चे को पर्याप्‍त ऑक्‍सीजन नहीं मिल पा रहा है या उसे कोई अन्‍य समस्‍या है।एक्‍सटर्नल फीटल हार्ट मॉनिटरिंग

इस तरीके में बच्‍चे की दिल की धड़कन सुनने और रिकॉर्ड करने के लिए एक डिवाइस को पेट के ऊपर लगाया जाता है। यह एक प्रकार का मॉनिटर होता है जिसे डॉपलर अल्‍ट्रासाउंड डिवाइस कहते हैं। जब प्रेगनेंट महिला चेकअप के लिए जाती है, तो उस दौरान बेबी की दिल की धड़कन चेक करने के लिए, यह टेस्‍ट किया जाता है। लेबर के दौरान बच्‍चे के हार्ट रेट को चेक करने के लिए भी यह टेस्‍ट किया जाता है।
​इंटरनल फीटल हार्ट रेट मॉनिटरिंग
इसमें शिशु के सिर के ऊपर एक पतली-सी तार लगाई जाती है। ये तार गर्भाशय ग्रीवा के जरिए शिशु तक पहुंचती है और इसे मॉनिटर से कनेक्‍ट किया जाता है। इस तरीके से हार्ट रेट की बेहतर रीडिंग मिलती है। लेकिन यह तरीका तभी अपनाया जाता है, जब प्रेग्‍नेंसी के दौरान शिशु के आसपास की फ्लूइड से भरी थैली फट जाती है और गर्भाशय ग्रीवा का मुंह खुल जाता है।
​कब की जाती है इंटरनल मॉनिटरिंग

जब एक्‍सटर्नल मॉनिटरिंग से सही रीडिंग न मिल पाए, तब इंटरनल मॉनिटरिंग की जा सकती है। लेबर के दौरान बच्‍चे के दिल की धड़कन को नजदीकी से देखने के लिए डॉक्‍टर इस तरीके का इस्‍तेमाल कर सकते हैं। लेबर के दौरान डॉक्‍टर बेबी ही हार्टबीट और यूट्राइन कॉन्‍ट्रैक्‍शन को देखेंगे। डॉक्‍टर नोट करते हैं कि आपको कब और कितनी बार यूट्राइन कॉन्‍ट्रैक्‍शन उठ रही है और कितनी देर तक रहती है। फीटल हार्ट रेट और कॉन्‍ट्रैक्‍शन एकसाथ रिकॉर्ड की जाती है। इन रिजल्‍ट को एक साथ देखकर इनकी तुलना की जा सकती है।
​क्‍यों पड़ती है फीटल हार्ट मॉनिटरिंग की जरूरत

अगर आपकी हाई रिस्‍क प्रेग्‍नेंसी है, तो आपके लिए फीटल हार्ट रेट मॉनिटरिंग बहुत जरूरी है। यदि आपको डायबिटीज है या हाई बीपी रहता है, तो आपकी हाई रिस्‍क प्रेग्‍नेंसी है। वहीं अगर बच्‍चा बढ़ नहीं रहा है या उसकी ग्रोथ ठीक से नहीं हो पा रही है, तो भी यह हाई रिस्‍क प्रेग्‍नेंसी है।

प्रीटर्म लेबर की दवाओं का शिशु पर क्‍या असर पड़ रहा है, यह जानने के लिए भी फीटल हार्ट रेट मॉनिटरिंग की जा सकती है। लेबर पेन बहुत जल्‍दी शुरू करने के लिए इन दवाओं की मदद ली जाती है।
​ये टेस्‍ट किए जा सकते हैं साथ

अन्‍य टेस्‍टों में फीटल हार्ट रेट मॉनिटरिंग का इस्‍तेमाल किया जा सकता है, जैसे कि :

नॉन स्‍ट्रेस टेस्‍ट : इससे बेबी के मूव करने पर, उसकी हार्ट रेट पता चलती है।
कॉन्‍ट्रैक्‍शन स्‍ट्रेस टेस्‍ट : इसमें यूट्राइन कॉन्‍ट्रैक्‍शन के साथ फीटल हार्ट रेट मापी जाती है।
बायोफिजिकल प्रोफाइल : इस टेस्‍ट को नॉन स्‍ट्रेस टेस्‍ट के साथ अल्‍ट्रासाउंड के साथ किया जाता है।

​ये चीजें कर सकती हैं प्रभावित
लेबर के दौरान निम्‍न चीजें फीटल हार्ट को प्रभावित कर सकती हैं :

यूट्राइन कॉन्‍ट्रैक्‍शन
लेबर के दौरान एनेस्‍थीसिया या दर्द की दवा
लेबर के दौरान टेस्‍ट
लेबर के दूसरे स्‍टेज पर पुश करने

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